हेअटल
हृदय कापूर्णसत्य
थीतुम्हारेलिए कविता
संवेदना की सूक्तिसी
शब्द की शक्तिसी
हृदय की भक्तिसी
तुम्हारीमूलप्रकृतिसी
दूसरीतरफराजनीति
उनकेलिए ‘राज’
तुम्हारेलिए ‘नीति’
जीवनका ‘अर्धसत्य’थी,तुम्हारे शब्दोंमे
परराष्ट की मांगथीकुछदूसरेअर्थोंमें
तुमनेउसेस्वीकारकिया
सर्पकोकंठकाहारकिया
भीड़ काकोलाहल
औरइसभीड़ में
कुछछूुटनेलगीकविता
परइसकीयादलिए
तुम बढ़तेरहे
तिल-तिलजलतेरहे
ताकिराष्टरथ बढ़तारहे
राजकानीतिपरहोतारहाआघात
कबतककविताकादिलसहसकतावज्रपात
तुम देख न पाए मुस्कुराते शत्रु की मांद
तुम्हारीपीठमें धंसाछुरीसाचांद
फिरतुम शांतहोगये
बरसों के साथी शब्द
सदाकोक्लांतहोगये
लगताहैंआंखों के पानी संग
तुम्हारेहृदय की बहतीथीसरिता
आजचिरमौनहोगयी वो कविता
