मुन्नार: अपने इस अज्ञान को स्वीकारने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि मुन्नार का नाम एक हिल स्टेशन के तौर पर मैने संजीदगी से स्वीकार नहीं किया। एक उत्तर भारत का निवासी होने के नाते हिल स्टेशनों को लेकर मेरे पास लंबी कतार थी-लद्दाख से लेकर नैनीताल तक। पर मैं फिर कहूंगा कि हिमालय अतुलनीय हो सकता है पर हिल स्टेशनों की सूची में मुन्नार का किसी से मुकाबला नहीं। कोच्चि से हमारी मुन्नार की यात्रा तमाम उतार चढ़ावों से भरी थी। मार्ग के तमाम इलाकों में ईसाइयत का वर्चस्व हर जगह नजर आया। उत्तर भारत में जिस तरह हर चैराहे एक छोटा मंदिर या मजार नजर आ जाती है, उसी तरह यहां हर चैराहे यीशु की स्मृतिका के दर्शन हो जाते है। आधे सफर के बाद पहाड़ी रास्ता शुरु हुआ तो हमारे अचरज का ठिकाना नहीं रहा। नारियल के लिए जो केरल पहचाना जाता है वहां पर विषुवतीय इलाकों की तरह विशालकाय वृक्ष। ऐसे विशाल झरने जिनके दम पर कोई क्षेत्र अपने को हिल स्टेशन दर्ज करादे यहां द्वारपाल की तरह खड़े थे। और यह क्या….जिन चाय बागानों पर दार्जलिंग का अघोषित पेटेंट था वह तो यहां मुन्नार के चप्पे चप्पे को खूबसूरत कैलेंडर की शक्ल दे रहे थे। टैवल आपरेटर के जरिये हम झटका खा चुके थे सो हम सीधे स्टेट टूरिज्म के कार्यालय पहुंचे। उत्तर भारतीय कार्यालयों की अक्खड़ता यहां सिरे से नदारद थी। कुछ ही देर में हमारे सामने आफर था। आप चाहें तो अभी तुरंत सफर पर चल सकते हैं। सफर सात घंटे से ज्यादा का हो चुका था। पर हमने बिना एक मिनट गंवाए बैगेज को सफर की जीप में डाला, और सफर ए मुन्नार पर निकल पड़े।
मेहमाननवाजी का अघोषित नियम यह है सबसे पहले अतिथि के बच्चे को ध्यान रखा जाए। मेहमाननवाज मुन्नार ने शायद यह समझ लिया था। पहले पड़ाव पर डाइवर ने बताया कि आपके सामने है एक पहाड़ी पर हाथी की पीठ पर सफर का आफर। आद्या चिहुंक उठी। वो तो बच्ची थी हीं, उनकी मम्मी ने भी बच्ची बन कर हाथी का सफर तय करने की घोषणा कर दी। बच्चा बनने का मौका मैं भी कब मौंका गंवाने वाला था। पर साहब यह कतई बचकाना खेल नहीं था। हाथी की पीठ पर बैठना ही जंग लड़ने से कम नहीं था। हम सब डिफेक्टेड पीस थे। फिर उबड़ खाबड़ पहाड़ी। महिला ब्रिगेड तो इस हाल में मस्त थी पर मुझे हाथी की पीठ पर बैठना ऐसा लग रहा था कि पुरखों के करम से अनचक्के ही सत्ता मिल गयी हो, पर कुर्सी अब न छोड़ी जा रही हो और न पकड़े। पर किसी भी हालत में सेल्फी का मौंका न गंवाने का संकल्प था। डाइवर एसएलआर कैमरा चला लेता था तो आनंद आ गया। हथिनी का नाम पूछा तो महावन ने बताया-यमुना। उत्तर भारत की नदियों के प्रति दक्षिण का जो प्रेम है उसकी झलक यह नाम दे रहा था। जैसे देवता साझा हैं वैसे ही प्रकृति के प्रति प्रेम भी साझा है। आद्या को जमुना भा गयी। और यात्रा के अंत में हमारे हाथों से उसने अन्न्नानास इस अंदाज में खाए, उसकी याद सदा के लिए दिलों में भर गयी।
रास्ते में चंद पुराने बांधों दिखे। खूबसूरत लैंड स्केप था। पर नदी की अल्हड़ जलधारा थम चुकी थी। पानी बंधकर शांत था जिसपर मौन नौकाएं विहार कर रही थी। दूसरी तरफ निकलती नहरों में किसानों के लिए सिंचाई का सपना था। विकास के सामने सदियों से एक सवाल रहा है। प्रकृति में किस हद तक दखल। संतुलन ही संभवतः एकमात्र विकल्प है पर इस शब्द की शक्ल हर वक्त बदलती रहती है।
पेट खाली थे तो छिटपुट खाकर ही गुजारा करना था। फल बेहतर विकल्प थे। जगह जगह पर आम और अन्नानास बेचने वालांे की कतार थी। मुन्नारी कच्चे आमों का स्वाद लाजवाब था। न ज्यादा खट्टा न मीठा। जुबान के जायके के लिए पर्फेक्ट। नमक मिर्च का साथ इसे और जायकेदार बना देता था।
बांध से लौटे तो डाइवर एक गिफ्ट के साथ तैयार था। उसने जंगली हाथियों के एक झुंड को टेªस कर लिया था। हमारी जीप पहाड़ पर बनी सड़क पर थी और हाथी घाटी में नदी तट पर। धूप का लुत्फ उठा रहे थे जंगल के असल बाहुबली। डाइवर ने बताया कि आप लकी हैं जो जंगली हाथियों को देख सके। हमें सुन कर और मजा आ गया।
रास्ते में डाइवर ने वे शूटिंग लोकशन्स भी दिखाईं जहां तमाम उत्तर दक्षिण भाषाओं की फिल्मों की शूटिंग हुई। कैमरे के लिहास से उनकी जरूरत होगी। क्योंकि हमें तो मुन्नार का चप्पा चप्पा शूटिंक के लिए मुफीद लग रहा था।
रास्ते में चाय के तमाम बागा तो ऐसे मिले जिनमें बाड़ तक न थी। सो इसे निमंत्रण माना गया। जीप रुकवाई गयी। हम बागान के बीच पहुंच गये। चाय के फूल, फल सब देखे। चाय के उन उन झाड़ियों को करीब से पहचान की जो छोटी पर बेहद मजबूत थी। जो बिना नजर आये अपनी शिखर पर हरियाली की छत सी तान लेती थीं। बिल्कुल फिल्मी लोकशन। कैमरे ने कत्र्तव्य पूर्ण किया। सेल्फी संतृप्त हुई और हम रवाना। डाइवर मुस्कुराता रहा। कह रहा था कि हम टाप प्वाइंट की ओर जा रहे हैं और हमारा लक्ष्य था। रास्ते में कीटभक्षी वृक्ष दिखा जो अपने खूबसूरत फूलों के सहारे मच्छरों का शिकार करता था। पुराना फलसफा ताजा हो गया-खूबसूरती खासी खतरनाक भी हो सकती है।
टाप प्वाइंट वास्तव में मुन्नार से तमिलनाडु सीमा पर था। हम पर्वत के ऐसे बिन्दु पर पहुंच गये थे जहां से चारों तरफ चाय के बगान नीचे ढलते नजर आ रहे थे। हरियाली, हरियाली सिर्फ हरियाली। तलहटी से एक विशाल पर्वत आरंभ हो रहा था। पर्वत की चोटी पर बादल खिलवाड़ कर रहे थे। बादलों की एक छोटी सी टोली अस्त होते सूर्य के साथ भी खेल रही थी। इस लुकाछिपी के दौरान हर पल वातावरण को एक अलग शेड से रंग देती थी यह रौशनी। हम अपने आप को रोक नहीं पाये। और चाय के बागान में उतरते चले गये। दूर पहाड़ की तलहटी पर बसा पूरा शहर नजर आ रहा था। अनूठा लैंड स्केप। हम जिस जगह थे वहां पर एक चाय का छोटा सा ढाबा था। पर चाय की तमाम किस्में उसके पास मौजूद थी। यूएसपी के तौर पर स्थानीय जड़ी बूटियां भी थी। लाजवाब लैमन टी की चुस्कियों के बीच हम प्रकृति की अनूठी छटा का आनंद ले रहे थे।
होटल ओल्ड मुन्नार में लिया। खिड़की से विशाल प्ले ग्राउंड नजर आता था। क्रिकेट को लोग यूंही अब देश का धर्म नहीं कहते। अगली सुबह जल प्रपात देखने पहुंचे। टूरिस्ट स्पाट होने के बावजूद यहां प्रकृति से खिलवाड़ नहीं किया गया है। सड़कें, होटल आदि सब है पर मुख्य प्राकृतिक स्थल से कुछ दूरी पर सब विदा हो जाते हैं। पास रह जाती है सिर्फ प्रकृति। झरने के पास दृश्य अनूठा था। विशाल प्रपात की गर्जना करती धार जिसके छींटे उंचाई तक उछल रहे थे। उपर आकाश से शांत फुहार पड़ रही थी। नीचे शीतल जल का आधार। बूंदों के ही तीन रूप, सबका अपना अहसास, सब अनुपम। हाथ में फ्रैक्चर के साथ आद्या ने ऐलान कर दिया-मुझे नहाना है, कैसे भी। प्रकृति ऐसी थी कि न मम्मी ने मना किया न पापा ने। बस जुगाड़ में जुट गये। आसपास की दुकानों से स्नान के कपड़े मैनेज किये गये। कैमरे के रेन कवर से प्लास्टर को कवर किया गया और हम कूद पड़े पानी में। एक्सरे न कराने का एडवांटेज मेेरे पास था सो मैं तो धार के ठीक नींचे पहुंच गया। जल धार इस तीव्रता से पर एक से शरीर पर पड़ती थी, आपका सम्पूर्ण अस्तित्व ही प्रकृति के साथ लयबद्ध हो जाता है, ध्यानस्थ सा। वहां से आगे हमने काफी के बागान देखें, चंदन के वन देखें। अंदर प्रवेश वर्जित था। कुछ फुटकर वृक्षों को छूने अहसास करने का मौका मिला। नाम और जानकारी की दृष्टि से इसमें यकीनन रोमांच था, पर इससे बहुत ज्यादा कुछ नहीं।
मुन्नार की याद का एक अहम हिस्सा है लोकहार्ट टी फैक्टी। चाय की पत्तियां का सफर किस तरह बागान से शुरु होकर डिब्बा बंद होने तक। पुराने जमाने की दादी मां की तरह वे चाय बनाने का नुस्खा छिपाते भी है और बताना भी चाहते हैं। मुन्नार में आपके पास मौका है भारतीय युद्धकला कलारिपट्टू के योद्धाओं से मिलने के लिए। तलवारों और आग के साथ
