साधना का पर्व
पूर्ण होने के बाद
रावण पर राम की
विजय ज़रूरी है
हाँ, विजय के बाद
राम रह जाना उससे
भी ज़रूरी है
विजय ज़रूरी है
क्योंकि
उपभोग और अहम् का रावण
हो गया है
अतिकाय
महाकाय
वसुधा का विजेता
दशमुख है वो
ज्ञान से लेकर शौर्य के सिर
पर सब सिर्फ स्वार्थ के लिए
स्वार्थ के लिए
हर ले गया
वह संस्कृति की सीता
कुबेर का वैभव
कर में ले गया
ऋषियों का रक्त
और दूसरी तरफ
राज तक छोड़ चुके राम
-अनासक्त
पर देव का दायित्व
हर युग में
सत्य का पक्ष
तो उपेक्षितों का आलिंगन कर
परास्तों में प्राण भर
रण में आये राम
अब
अनिवार्य
एक ही कार्य
सुखाना होगा
नाभि का वह ‘अमृत’
जो बना रहा है
व्यवहार में,
विचार में
स्वार्थ को शाश्वत
उपभोग को अपरिमित
अहम् को अभीप्सित
शीघ्र हो शंखनाद
विजय का
महाकाय पर अतिसूक्ष्म आत्म का
स्वार्थ पर सहयोग का
‘अधिकार’ पर संस्कार का
कुविचार पर सद्विचार का2

