मेरा कमरा
बिखरे कागज
बिखरे कपड़े
और वो लगाती है अधिकार भरी झिड़की।
और मन के भीतर बिखरा ककहरा
कहीं कांच सा-कहीं किरिच सा
रात के सन्नाटे मे
मैं
उन्हें
पुकारता हूं
पुचकारता हूं
उनको कविता बनाता हूं।
मेरा कमरा
बिखरे कागज
बिखरे कपड़े
और वो लगाती है अधिकार भरी झिड़की।
और मन के भीतर बिखरा ककहरा
कहीं कांच सा-कहीं किरिच सा
रात के सन्नाटे मे
मैं
उन्हें
पुकारता हूं
पुचकारता हूं
उनको कविता बनाता हूं।